ऐ मधुर मनोहर ख्वाब

ऐ मधुर मनोहर ख्वाब हमारे, क्यों नहीं हमे प्रकाशवान  करते हो,
मंदबुद्धि लिए विचरता है मन हमारा , उसे ज्योति क्यों नहीं दिखलाते हो,
मधुर मधुर सी मनमोहक कर्मो की छाप क्यों नहीं छोड़ जाते  हो,
मनुस्य भटक रहा इस बवंडर में , कर्म की परिभाषा क्यों नहीं बतलाते हो,
कोमल कोमल हृदय तुम्हारा फिर यह मन क्यों विचरता है,

प्रभु की भक्ति कर कर्म करो, ये धर्म हमे सिखलाता है,
अक्सर क्रोध के आवेश में, हम स्वयं को भूल जाते है,
ए मधुर मनोहर  ख्वाब मेरे, क्यों नहीं फिर वो धर्म हमे दिखलाते हो,
विकट परिस्थिति बन चुकी जो, उसका समाधान क्यों नहीं ख्वाब में लाते हो,
ए मधुर मनोहर ख्वाब मेरे, सपनो में जान क्यों नहीं भर जाते हो ,

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